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शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

'झन् से सांस की बेड़ियां टूटीं '

गुणाकर मुले भी चले गए। दीवाली से एक दिन पहले- शुक्रवार को। उसी दिन उनकी अंत्येष्टि भी हो गई। मुझे अगले दिन, एक हिंदी दैनिक के अंदर के पृष्ठ पर नीचे एक कोने में छपी खबर से जानकारी हो पाई। कई मित्रों से फोन पर दरियाफ्त किया। उन्हें भी कोई सूचना नहीं थी। उनमें से एकाध दूरदराज के उनके संबंधी भी होते हैं। इस तरह चुपचाप उनका चले जाना, दोस्ती के नाते तो व्यथित करता ही है, एक लेखक के रूप में उनका जो कद था उसके मद्देनजर भी उनकी गुमनाम अंतिम विदाई हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता की मौजूदा चिंताओं और प्राथमिकताओं को लेकर गहरे सवाल खड़े करती है। गुणाकर मुले कविता, कहानी, उपन्यासादि साहित्य-चर्वण करने वाले लेखक नहीं थे, उन्होंने प्राचीन विज्ञान-तकनॉलॉजी, पुरातत्त्व, पुरालिपिशास्त्र, मुद्राशास्त्र, इतिहास और संस्कृति की दुरूह और दुर्गम सरणियों का उत्खनन-अवगाहन किया था। लगभग 30 मौलिक ग्रंथ, दो हजार से ऊपर असंकलित हिंदी लेख, सौ से ऊपर अंग्रेजी शोध-निबंध उनके प्रभूत कृतित्व का अंग हैं। इतिहास-पुरातत्व की अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद भी उन्होंने हिंदी में किया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन, भदंत आनंद कौसल्यायन के व्यक्तित्व -चिंतन और कृतित्व के संभवतः अकेले विशेषज्ञ हिंदी में वही थे। गुणाकर मुले वस्तुतः राहुल सांकृत्यायन, वासुदेव विष्णु मिराशी, वासुदेव शरण अग्रवाल, मोतीचंद्र और भगवतचंद्र उपाध्याय वाली महान मनीषी परंपरा की हिंदी में अंतिम कड़ी थे।
गुणाकर जी का जन्म 3 जनवरी 1935 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक गांव में हुआ था। मराठी मूल के होने के बावजूद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित में एम.ए. किया और लेखन के लिए हिंदी व अंग्रेजी भाषाओं को माध्यम बनाया। वर्षों दार्जीलिंग स्थित राहुल संग्रहागार से संबद्ध रहने के उपरांत 1971-72 के दौर में वे दिल्ली आ गए थे और फिर दिल्ली ही उनके जीवन का अंतिम पड़ाव बनी। यहीं उन्होंने विवाह किया, घर बसाया और रहे। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि सिविल मैरिज के दौरान कोर्ट के सम्मुख मुले जी के पिता की भूमिका बाबा नागार्जुन ने निभाई थी। अंत तक वे राहुल जी, भदंत आनंद कौसल्यायन को अपने गुरु के रूप में और नागार्जुन को पितृवत् मानते रहे।
गुणाकर जी से मेरा प्रथम परिचय 1971-72 के दौर में कवि श्री विष्णुचंद्र शर्मा ने टी हाउस-कॉफी हाउस की गहमागहमियों के बीच कराया था और तब से उनसे निरंतर मैत्रीपूर्ण संबंध बना रहा। उनके व्यक्तित्व में जहां एक प्रकांड विद्वान समाहित था, वहीं एक गहरेबाज मित्र भी जमा बैठा था। सालों के अंतराल के बाद भी- और भीड़ में भी खुद आगे बढ़ कर टहोकते थे और समय का अंतराल उनकी शहद जैसी गाढ़ी-आत्मीय आवाज में दब जाया करता था। कभी उनसे आये दिन मुलाकातें होती रहती थीं- काफी हाउस में, 25 बाराखंभा रोड में, जफर मार्ग पर जनसत्ता के दफ्तर में। एकाध बार पांडव नगर स्थित उनके घर भी जाना हुआ। मेरे पारिवारिक आयोजनों में भी उन्होंने शिरकत की। फिर फिराक गोरखपुरी की तर्ज पर वह दौर आया कि 'अब यादे-रफ्तगां की भी हिम्मत नहीं होती/ यारों ने इतनी दूर बसाई हैं बस्तियां...' । पिछले तीन-चार सालों के दरमियान सिर्फ एक बार एक विवाह समारोह में गुणाकर जी से मुलाकात हुई। फोन पर भी, अस्वस्थता के हवाले से, उनकी शहद घुली आवाज सुन पाना संभव नहीं रह गया था। ...और आखिरश् इस तरह 'झन् से सांस की बेड़ियां टूटीं ' कि 'मेरी कहानी में वह नाम' भी नहीं रहा।
- सुरेश सलिल

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