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शुक्रवार, 25 जून 2010

आज का ‘स्पेस वेदर’ देखा क्या?

क्या आपने स्पेस वेदर यानि अंतरिक्ष के मौसम की जानकारी लेने के बारे में कभी सोंचा है ? आम लोगों के लिए 'स्पेस वेदर' ये शब्द ही शायद नया है, लेकिन अब ये शब्द जल्दी आपको प्रमुखता से नजर आने वाला है। बिजलीघरों, तेल शोधन संयंत्रों और रेलवे के लिए तो अब हर बीतने वाले दिन के साथ स्पेस वेदर की निगरानी करना बेहद जरूरी होता जाएगा। इसकी वजह बताने से पहले स्पेस वेदर से परिचित कराना जरूरी है। स्पेस वेदर का सीधा मतलब हमारे सूरज से है। स्पेस वेदर हमें बताता है कि सूरज से विकिरण का तूफान कब उठने वाला है? ये कितना तीव्र होगा ? और इसकी दिशा क्या होगी ?
धरती पर जिंदगी के लिए सूरज हमेशा से ही महत्वपूर्ण था, लेकिन इसकी अहमियत अब इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि हम हर पल इसकी निगरानी कर रहे हैं। हाल में कुछ अखबारों में खबर छपी थी कि 2013 में सूरज से इतना जबरदस्त तूफान उठने वाला है कि धरती पर भारी तबाही आ जाएगी। कई टीवी न्यूज चैनलों ने इस खबर को काफी बढ़ाचढ़ाकर भी दिखाया था। लेकिन इस खबर में दो बातें एकदम आधारहीन हैं, पहली तो ये कि सूरज से तूफान कब उठेगा इसकी भविष्यवाणी हम कर ही नहीं सकते, दूसरा ये कि सूरज का तूफान धरती पर भारी तबाही ला देगा ये दावा एक सनसनीखेज बयान से ज्यादा और कुछ नहीं।
हां, ये सच है कि सूरज में एक बड़ी हलचल जारी है, लेकिन ये कोई नई बात नहीं। सूरज की निगरानी में जुटे दुनिया के कुछ बड़े सौर वैज्ञानिकों को असली परेशानी सूरज से उठने वाले मध्यम दर्जे के तूफान से है। क्योंकि सूरज से उठने वाला मध्यम दर्जे का एक विकिरण का तूफान हमारी धरती के चुंबकीय क्षेत्र को बुरी तरह से झिंझोड़ सकता है। अगर ऐसा होता है तो पूरी तरह टेक्नोलॉजी पर आधारित हमारी दुनिया के लिए भारी मुसीबत खड़ी हो सकती है। नई खबर ये है कि दुनिया के कुछ हिस्सों में रेलवे सिगनल्स काम करना बंद कर सकते हैं, कच्चे तेल और गैस को शोधक संयंत्र तक ले जाने वाली पाइपलाइनों में अचानक इतनी जंग लग सकती है कि उनके लीक होने का खतरा पैदा हो सकता है और शहरों को बिजली की आपूर्ति करने वाले ग्रिड स्टेशंस अचानक ठप हो सकते हैं।
दरअसल विकिरण के तूफान के साथ सूरज से आवेशित कणों की तेज बौछार भी फूट पड़ती है, जिसे कोरोनल मास इजेक्शन यानि सीएमई कहते हैं, समस्या की असली वजह ये सीएमई ही है। अगर सूरज से मध्यम दर्जे का कोई विकिरण का तूफान फूटता है और उसके साथ उठने वाले आवेशित कणों की तेज बौछार के सीधे निशाने पर पृथ्वी आ जाती है, तो इसका पहला असर होगा पृथ्वी की कक्षा में मौजूद सेटेलाइट्स पर। कुछ समय पहले सूरज से फूटे विकिरण के एक हल्के तूफान ने अमेरिका के एक संचार सेटेलाइट को जलाकर बेकाबू कर दिया है। अब ये सेटेलाइट आसपास के दूसरे सेटेलाइट्स के लिए खतरा बना हुआ है। ऐसी स्थिति अंतरिक्ष में मौजूद इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और उसके अंतरिक्षयात्रियों के लिए भी आपातकालीन होगी।
1859 में सूरज से एक बहुत बड़ा तूफान उठकर सीधे धरती से आ टकराया था, इससे अमेरिका में टेलीग्राफ लाइनें बर्बाद हो गईं थीं और कई मिलों की मशीनों को भारी नुकसान पहुंचा था। सूरज से ऐसा तूफान आमतौर पर दस-ग्यारह साल में एक बार आता है। 1989 में कनाडा का क्यूबेक शहर की बिजली अचानक फेल हो गई और पूरा शहर 9 घंटे तक अंधेरे में डूबा रहा, बाद में पता चला कि सौर विकिरण का तूफान ही इसकी वजह था।
मध्यम से छोटे दर्जे के सौरतूफान रेलवे सिगनल्स को अचानक ही खराब कर किसी बड़ी दुर्घटना की वजह भी बन सकते हैं। मिसाल के तौर पर 2000 से 2005 के बीच उत्तर पश्चिमी रूस के आर्चांगेल प्रांत में रेलवे सिगन्स कई बार अचानक ही खराब हो गए। रूस के त्रोइत्स्क में काम कर रहे पुश्कोव इंस्टीट्यूट आफ टेरेस्ट्रियल मैग्नेटिज्म, आयनोस्फियर एंड रेडियो वेव प्रोपेगेशन ने रेलवे सिगनल्स की इन खराबियों का खास अध्ययन किया। पता चला कि रेलवे सिगनल अचानक ही घंटों तक रेड हो गए थे, जबकि ट्रैक एकदम खाली था। फिर अचानक ही वो लगातार हरे और लाल होने लगे थे। पुश्कोव इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक इरोशेन्को ने पता लगाया कि रेलवे सिगनल्स की इन खराबियों की असली वजह 'स्पेस वेदर' का सौर विक्षोभ ही था।
हमारे देश में रेलवे सिगनल्स की ऐसी अस्वाभाविक खराबी की फिलहाल कोई रिपोर्ट नहीं है। इसका मतलब ये नहीं कि सूरज से फूटने वाले आवेशित कणों के बादल केवल रूस या विदेशों में ही असर दिखाते हैं, बल्कि इसका अर्थ ये है कि हमारे लिए ये बिल्कुल नई जानकारी है और वैज्ञानिकों और खुद रेलवे ने रेलवे ट्रैक के सिगनल से सूरज की छेड़खानी को अभी गंभीरता से लिया ही नहीं है।
वैज्ञानिक इरोशेन्को की टीम में शामिल हेलसिंकी के फिनिश मेट्रोलॉजिकल इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक रिस्टो पिरजोला सुझाव देते हैं कि अगर हर देश का रेलवे विभाग अपने सिगनल में आई खराबी के दिन और वक्त का हिसाब रखने लगे तो वैज्ञानिकों को इसके पीछे सौर तूफान की भूमिका को समझने में मदद मिलेगी। रेलवे सिगनल्स को सूरज के इस हस्तक्षेप से बचाने का तरीका काफी आसान है हमें बस कुछ उपकरण बदलने होंगे। लेकिन अगर भारत जैसे विशाल रेलवे नेटवर्क वाले देश की बात करें तो रेलवे सिगनल को बचाने का ये खर्च ही शायद अरबों रुपये तक आएगा।

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