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रविवार, 11 जुलाई 2010

उल्काओं की दुनिया में मिशन रोसेटा

आप जो तस्वीर देख रहे हैं, ये तस्वीर है हमसे करीब 29 करोड़ किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में आवारा घूम रही एक विशाल उल्का 'ल्यूटेशिया' की। उल्का 'ल्यूटेशिया' का आकार 100 किलोमीटर से भी बड़ा है और उल्का ल्यूटेशिया का ये तस्वीर ली है इसके करीब जा पहुंचे यूरोपियन स्पेस एजेंसी के स्पेसक्राफ्ट रोसेटा ने। 2010 ऐसे ऐतिहासिक साल के तौर पर याद किया जाएगा, जब पहली बार हम खुद उल्काओं तक चलकर गए, उन्हें छूकर देखा और वहां की धूल-मिट्टी के नमूने भी साथ लेकर आए। हाल ही में हमें धरती पर वापस लौटे जापान के हयाबुसा मिशन के कैप्सूल से हमें उल्का इटोकावा की धूल हासिल हुई है। ये उल्का इटोकावा हमसे करीब 30 करोड़ किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में आवारा घूम रही है। उल्काओं के अध्ययन में साल की दूसरी सबसे अहम घटना के तौर पर यूरोपियन स्पेस एजेंसी का खास मिशन रोसेटा अब 'ल्यूटेशिया' नाम की एक विशाल उल्का के करीब जा पहुंचा है।
1852 में खोजी गई 100 किलोमीटर से भी विशाल उल्का 'ल्यूटेशिया' धरती से देखने पर अंधेरे आसमान में रोशनी के एक छोटे से बिंदु के रूप में नजर आती है। इस विशाल उल्का की इतनी साफ और इतने करीब से तस्वीर पहली बार ली गई है और इस तस्वीर को लेते वक्त स्पेसक्राफ्ट रोसेटा इस उल्का से करीब 3100 किलोमीटर दूर था। मंगल और बृहस्पति के बीच मौजूद उल्काओं की बेल्ट ही 'ल्यूटेशिया' का घर है। 2004 में धरती से रवाना हुआ मिशन रोसेटा अब उल्का 'ल्यूटेशिया' के घर जा पहुंचा है और 52,142 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हुए रविवार रात करीब पौने दस बजे ये स्पेसक्राफ्ट इस विशाल उल्का के सबसे करीब से गुजर रहा है। मिशन रोसेटा करीब दो घंटे तक उल्का 'ल्यूटेशिया' के चक्कर लगाएगा और उसकी तस्वीरें और दूसरे वैज्ञानिक अध्ययन कर तमाम डेटा धरती को भेज देगा। मिशन रोसेटा के लिए उल्का 'ल्यूटेशिया' बस एक पड़ाव भर है, इसकी असली मंजिल 'कॉमेट 67पी/ कुर्व्यूमोव-गेरासिमेंको' नाम का एक धूमकेतु है। मिशन रोसेटा अपनी मंजिल इस धूमकेतु पर 2014 को पहुंचेगा। यहां पहुंचकर रोसेटा एक लैंडर को इस धूमकेतु पर उतारेगा और इस धूमकेतु से धूल और बर्फ के सैंपल लेकर उसे हमारे पास वापस भेज देगा।
उल्काओं और धूमकेतु दरअसल टाइम कैप्सूल्स हैं, यानि यहां उस वक्त का वो सारा पदार्थ मौजूद है, जब हमारे सौरमंडल का निर्माण हो रहा था। ग्रहों और चंद्रमाओं के बनने के दौरान जो कुछ बचा रह गया वो पदार्थ उल्का और धूमकेतु की शक्ल में सौरमंडल में आवारा घूम रहा है। इसीलिए उल्काओं और धूमकेतुओं का मिशन हकीकत में खुद को जानने और अपनी दुनिया को समझने का मिशन है।

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